Sunday, September 7, 2014

रणकोट - आदर्श गांव-निर्मल गांव - खुद ही निकालो गंगा

उत्तराखंड की गंगोलीहाट तहसील का गांव है "रणकोट"। नब्बे परिवारों के इस गांव में चार साल पहले कोई सरकारी अधिकारी जाना पसंद नहीं करता था। लेकिन आज उत्तराखण्ड ही नहीं देश-विदेश के अधिकारी भी यहां पहुंचकर गांव की बदलती तस्वीर देखकर अचम्भित हैं।
चार साल पहले इस गांव में काम करने का संकल्प लिया था राजेन्द्र सिंह बिष्ट नाम के एक युवक ने। इस "हरिजन ग्राम" के लोग मेहनती हैं, इस सच्चाई को भांपकर राजेन्द्र सिंह ने अपने साथियों के साथ लोगों को इस बात का विश्वास दिलाया कि "थोड़ा श्रमदान- थोड़ा अंशदान" से गांव की किस्मत बदली जा सकती है। तब गांव में एक समिति बनाई गई बहादुर राम और नंदनी देवी के नेतृत्व में। सबसे पहले जलस्रोत की मरम्मत हुई, पानी एकत्र करने के लिए प्राकृतिक गड्ढे बनाये गए। इसके पश्चात एक लाख चालीस हजार रु. एकत्र करके फिल्टर टैंक, पाइप इत्यादि लगाने का कार्य श्रमदान से पूरा हुआ। घर-घर तक जब पानी पहुंचा तो लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। ग्रामीणों का ये प्रयास "भगीरथ की मेहनत से गंगा निकालने" से कम नहीं था। गांव के लोगों के काम को सरकार ने सराहा और "सर रतन टाटा ट्रस्ट" ने भी। ट्रस्ट ने इस गांव में घर-घर शौचालय बनाने की योजना बनाई। गांव वालों ने खुद श्रमदान करके तीन महीने के भीतर 90 के 90 घरों में शौचालय बना डाले। राज्य सरकार ने इस गांव की पूरी तस्वीर केन्द्र सरकार के पास भेजी और सन् 2006 में इस "रणकोट" गांव को "निर्मल ग्राम पुरस्कार" मिला। पुरस्कार में मिली दो लाख रु.की राशि को गांव वालों ने राजेन्द्र बिष्ट को देने का निर्णय किया। लेकिन उन्होंने उक्त राशि को गांव वालों की कुछ राशि के साथ मिलाते हुए हर घर में "रसोई गैस" की सुविधा दिलाने में खर्च करवा दिया। अब हर घर में लकड़ी नहीं बल्कि "गैस" से खाना पकता है।
राजेन्द्र बिष्ट कहते हैं, "चार सालों की मेहनत से अब पूरा गांव साफ-सुथरा हो गया। साफ-सफाई से बीमारियां दूर हो गईं। पूरा गांव धुआंरहित हो गया। जंगल बच गया। जंगली जानवरों से महिलाएं-बच्चे निजात पा गये।" राजेन्द्र बिष्ट कहते हैं कि अब यहां के बच्चे ज्यादा संस्कारी व शिक्षित होंगे। जागरूक भी होंगे, इन्हें अब अपने लिए काम करना आ गया है। सरकार करे या न करे, इन्हें हिमालय से गंगा निकालना आ गया है। बहादुर राम, नंदनी देवी, अनुलीदेवी, सुंदर राम अपनी तकदीर खुद लिखना सीख गये हैं।

Source : http://panchjanya.com/arch/2009/8/16/File20.htm
 

Sunday, July 6, 2014

गुजरात का पुंसरी गांव: INDIA के लिए बना रोल मॉडल, देखें तस्वीरें...

गुजरात का यह गांव: INDIA के लिए बना रोल मॉडल, देखें तस्वीरें...

(पुंसरी गांव का मुख्य प्रवेश द्वार)
 
 
अहमदाबाद। गुजरात के साबरकांठा जिले का गांव पुंसरी देश के करीब 6 लाख गांवों का रोल मॉडल बनने जा रहा है। सोमवार को यहां केंद्रीय ग्रामीण विकास विभाग के अतिरिक्त सचिव एलसी गोयल आने वाले हैं। 28 साल के सरपंच हिमांशुभाई नरेंद्र पटेल कहते हैं, 6000 की आबादी वाले हमारे गांव में 2006 तक कुछ नहीं था। चरनोई की भूमि बेचकर जो पैसा मिला, उससे विकास करते गए। 
 
अब यहां पांच स्कूल हैं, सभी में एसी और सीसीटीवी लगे हैं। माता-पिता घर बैठे देख लेते हैं कि उनका बच्चा स्कूल में क्या कर रहा है। पूरे गांव में कैमरे लगे हैं। पक्की सड़कें, दूध लाने ले जाने वाली महिलाओं के लिए अटल एक्सप्रेस नाम की बस सेवा। पूरा गांव वाई-फाई। गांव में 120 स्पीकर लगे हैं। यदि सरपंच को कोई घोषणा करनी हो या फिर भजन का आयोजन। ये स्पीकर ही माध्यम बनते हैं। बच्चों का रिजल्ट भी इसी पर घोषित होता है।

गुजरात का यह गांव: INDIA के लिए बना रोल मॉडल, देखें तस्वीरें...

(मिनरल वॉटर सप्लाई करने वाला ऑटो)
 

मिनरल वॉटर की सुविधा:
पूरे गांव में पीने के लिए शुद्ध पानी की व्यवस्था है। इसके लिए पंचायत और ग्रामीणों के सहयेाग से एक आरओ प्लांट की स्थापना की गई है। इस प्लांट से पानी को शुद्ध कर घर-घर सप्लाई किया जाता है। गांव के हरेक परिवार को सिर्फ 4 रुपए में 20 लीटर मिनरल वॉटर की बॉटल घर-घर पहुंचाई जाती है। 
 
वहीं अगर आपको ठंडा पानी चाहिए तो 20 लीटर मिनरल वॉटर की बॉटल 6 रुपए में खरीदी जा सकती है। इतना ही नहीं, अगर आपके पास रोज-रोज चार रुपए खुल्ले पैसे देने में दिक्कत आती है तो आप अपनी मर्जीनुसार कूपन भी खरीद सकते हैं। घर-घर तक पानी पहुंचाने के लिए ग्राम पंचायत ने एक ऑटो भी खरीद रखा है।
 
 गुजरात का यह गांव: INDIA के लिए बना रोल मॉडल, देखें तस्वीरें...
 
(इस तरह चमचमाता हुआ दिखता है पुंसरी गांव)
 

गांव को स्वच्छ रखने की व्यवस्था:
स्वच्छ पानी के अलावा ग्राम पंचायत ने गांव को स्वच्छ रखने के लिए सराहनीय प्रयास किए हैं। इसमें भी पंचायत को ग्रामीणों का पूरा सहयोग प्राप्त है। ग्रामीणों से कहा गया है कि वे कचरा इधर-उधर न फेंके। कचरे को किसी एक जगह एकत्रित कर रखें। रोजना सुबह पंचायत के कर्मी घर-घर जाकर कचरा इकट्ठा करते हैं और कचरा फेंकने के लिए भी गांव की सीमा पर विशेष इंतजाम किया गया है। इसीलिएइस गांव में कहीं भी कचरे का नामो-निशान नहीं मिलता।
 
 
 गुजरात का यह गांव: INDIA के लिए बना रोल मॉडल, देखें तस्वीरें...
(पुंसरी गांव की कंप्यूटराइज्ड ग्राम पंचायत)
 
 
इंटरनेट की सुविधा:
पुंसरी ग्राम पंचायत पूरी तरह से कंप्युटराइज्ड है। गांव के लोगों को इंटरनेट की सुविधा मिलती रही। इसके लिए पंचायत ने एक निजी कंपनी से वाई-फाई की सुविधा ले रखी है। युवा समय के साथ कदम मिला सकें, इस बात को ध्यान में रखते हुए सिर्फ 10 रुपए के रजिस्ट्रेशन करवा कर इंटरनेट का उपयोग किया जा सकता है। 
 
 
 
गुजरात का यह गांव: INDIA के लिए बना रोल मॉडल, देखें तस्वीरें...

(पुंसरी गांव के विकास मॉडल का नक्शा)
 

माइक का प्रयोग:
गांवों में स्कूलों सहित कई जगह सीसीटीवी कैमरे के साथ माइक भी लगे हुए हैं। माइक का प्रयोग ग्राम पंचायत द्वारा ग्रामीणों को किसी कार्यक्रम या इमरजेंसी की सूचना देने के लिए किया जाता है। जबकि शाम के समय इन माइकों का प्रयोग भक्ति गीत सुनने के लिए किया जाता है। बच्चों का रिजल्ट भी इसी पर घोषित होता है।
 
गुजरात का यह गांव: INDIA के लिए बना रोल मॉडल, देखें तस्वीरें... 
 
लायब्रेरी की व्यवस्था:
इस कांसेप्ट के लिए भी पंचायत ने एक लोटिंग ऑटो खरीद रखा है। ऑटो में सैकड़ों पुस्तकें होती हैं। गांव में ऑटो का समयनुसार रूट निश्चित किया गया है। इसके अनुसार ऑटो दिन भर में कई जगह एक तय स्थान पर पहुंचता है, जहां लोग अपनी पसंद की किताब पढ़ सकते हैं।
 
 
 
 

Saturday, March 29, 2014

गुजरात : इस गांव में आज भी कायम है 'रामराज', जानें रोचक तथ्य

राजकोट। गुजरात के इस गांव में ढूंढें से भी किसी के घर ताला नहीं मिलेगा, क्योंकि यहां कोई भी अपने घर में ताला नहीं लगाता। घर तो घर, दोपहर में दुकानदार अपनी दुकान खुली की खुली छोड़कर घर खाना खाने भी आ जाते हैं। ग्राहक दुकान पर आए तो अपनी जरूरत की वस्तु लेकर उसकी कीमत के रुपए दुकान के गल्ले में डालकर चला जाता है। सिर्फ एक घटना को छोड़ दें तो यहां आज तक कभी भी चोरी की घटना नहीं हुई। इस गांव में हुई चोरी की एकमात्र घटना भी कुछ ऐसी रही थी कि दूसरे ही दिन खुद चोर ही ने पंचायत में अपना अपराध कुबूल कर लिया था और इसका प्रायश्चित करने के लिए उसने मुआवजा भी दिया था। 
 
यहां गुटखा विरोधी अभियान चलाने की जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि यहां पहले से गुटखे पर प्रतिबंध था और इस नियम को कोई तोड़ता भी नहीं। ग्राम पंचायतों की दुकानों पर केरोसिन भी उचित कीमत पर ही मिलता है। गुजरात के सौराष्ट्र में स्थित है इस गांव का नाम है राजसमढियाला, जो राजकोट शहर से मात्र 22 किमी की दूरी पर स्थित है।
 
इसके बाद उन्होंने प्रति व्यक्ति के लिए एक वृक्ष लगाने का नियम बनाया। इसी का नतीजा है कि गांव में आप हर जगह हरे-भरे वृक्ष देख सकते हैं। ग्रामीणों के घर उद्यान की तरह बन चुके हैं। इतना ही नहीं इस गांव में ग्राम पंचायत से लेकर हरिजन कॉलोनी तक का नजारा किसी रिसोर्ट से कम नहीं दिखाई देता।
 
जाडेजा ने गांव में पानी की व्यवस्था भी इतने अच्छे तरीके से की आज जहां, पूरे सौराष्ट्र में पानी की किल्लत है वहीं, इस गांव में पानी की कोई कमी नहीं। इसके लिए जाडेजा ने बरसात के पानी को रोकने की व्यवस्था की, जिसके लिए तालाब बनवाया। इसके अलावा उन्होंने वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम पर भी काम किया, जिससे गांव की जमीन में जल का स्तर कभी नीचे ही नहीं जाता।
 
गांव की इस श्रेष्ठता का पूरा श्रेय जाता है यहां रहने वाले हरदेव सिंह जाडेजा को। एम.ए की पढ़ाई करने के बाद एसआरपी में जुड़े, लेकिन उनका मन नौकरी में नहीं लगा और उन्होंने नौकरी छोड़ दी। नौकरी छोड़ने के बाद गांव की राह पकड़ ली। गांव की राह भी उन्होंने कुछ इस अंदाज में पकड़ी कि पूरे गांव का नक्शा ही बदल डाला और सौराष्ट्र ही नहीं, पूरे गुजरात में गांव का नाम प्रसिद्ध कर दिया। एक अखबार के पत्रकार ने तो अपने एक लेख में लिखा भी था कि अगर देश इस गांव के नक्शे कदमों पर चलने चले तो पूरे देश का उद्धार निश्चित है। 
 
जाडेजा 1978 में इस गांव के सरपंच बने और इसके बाद से ही गांव की जीवन प्रक्रिया पूरी तरह से बदलने लगी। सरपंच बनने के बाद उन्होंने हर कहीं कचरा फेंककर गंदगी फैलाने, जुआ खेलने वालों, शराब पीने जैसी असामाजिक प्रवृत्तियों के खिलाफ नियम बनाया। इस नियम के तहत आरोपी को 30 हजार रुपए का दंड देना होता था। 
 
 
गुजरात : इस गांव में आज भी कायम है 'रामराज', जानें रोचक तथ्य.... 
सरपंच जाडेजा के कारण पूरा गांव स्वच्छ, सुरक्षित और समृद्ध बन सका है। इसलिए इस गांव के लोगों के साथ हमें भी उनका आभार व्यक्त करना चाहिए। जाडेजा यहीं नहीं रुके। गांव के विकास के बाद उन्हें गांव में एक स्टेडियम बनाने का भी विचार आया। उनके इस विचार को ग्रामीणों ने तुरंत स्वीकार किया और स्टेडियम हेतु पर्याप्त जमीन के लिए लिए अपनी-अपनी जमीनें भी दे दी। गांव में बने इस स्टेडियम में क्रिकेट की पांच टर्फ विकेट भी बनाई गई हैं।
इस बारे में जाडेजा कहते हैं कि स्टेडियम बनाने से पहले हमें हरेक प्रकार की प्राथमिक सुविधाओं पर भी ध्यान दिया। अब पूरे गांव में सीमेंट की सड़कें बन चुकी हैं। अब गांव को प्लास्टिक मुक्त गांव बनाने का अभियान चल रहा है। इसके लिए नियम बनाया गया है कि अगर कोई प्लास्टिक की थैलियों का कचरा इधर-उधर फेंकता है तो उसे 51 रुपए का दंड देना होगा। इसके तहत अब तक कई ऐसे घरों से 31 रुपए का हर्जाना लिया जा चुका है, जिनके घर के बाहर प्लास्टिक का कचरा पड़ा हुआ दिखाई दिया।

गुजरात : इस गांव में आज भी कायम है 'रामराज', जानें रोचक तथ्य....
इन सभी नियमों और ग्रामीणों की प्रतिबद्धता का कमाल है कि अब आसपास के गांव भी इस गांव का अनुसार करने लगे हैं। राजसमढियादा की समृद्धि को देखते हुए आसपास के खोलडदल, अणियारा, लीली साजडियाणी, भूपगण, लाखापर, तंब्रा जैसे गांवों में तो अब तक 130 चेकडेम भी बन चुके हैं।
 
तो अब आप क्या कहते हैं, एक हरदेवसिंह जाडेजा ने अपनी कर्मठता, दूरदर्शिता से पूरे गांव में रामराज्य स्थापित कर दिया। अगर ऐसी ही दूरदर्शिता और कर्मठता से अन्य लोग लोगों की भलाई में जुट जाएं तो इसमें कोई शक नहीं कि हमारे पूरे देश में रामराज्य स्थापित हो जाए।
 

Wednesday, September 5, 2012

पेड़ को बार बार पानी देने के झंझट से मुक्ति का उपाय

All you need to do is take an unglazed clay pot (matka) and place it underground, parallel to the roots of the plant or small trees. Fill it with water, cover it with the lid and cover the place. For about a week, you do not need to water the plant again. The pot will act as a natural drip irrigation vehicle. Please remember, you do not need to make holes in the matka. And if you wish to have a better result, then fill the pot with soiled water that is left out after washing of utensils. This method is already practiced in some parts of Gujarat. Friends, such small acts can one day sum up into a great deed, if we make them a part of our various resolutions.

I am also reminded of another heart touching incident that someone narrated to me in his letter. This took place in a village somewhere in Veraval region of Saurashtra. He wrote about a unique experiment by a teacher of the school for growing trees. Since that it is a water scarce area, it was impossible to get water for trees. The teacher therefore asked the students to bring soiled water left out after washing of utensils at home. Each student would carry a bottle of soiled water from home daily. The students were then asked to water the plants with the soiled water. As days passed, the students and school officials had a lush green garden before themselves! Thus a teacher’s small initiative created a green island in a dry and barren area, that too with waste water. In the process, he also taught the kids to make friends with Mother Nature. I was quite touched with this; hope you too will.
Please share such tips and experiments for conserving ecology, let’s all do our bit. 
( Narender Modi )
Source: http://www.narendramodi.in/a-daughter-a-tree-and-a-teacher/

Friday, October 21, 2011

पिछडा कोल्लमपल्ली आज बदल चुका

पिछडा कोल्लमपल्ली आज बदल चुका


कुछ समय पूर्व तक आंध्र प्रदेश राज्य के पालमूर (मेहबूब नगर) जिले में के अनेक गॉंवों के समान सुस्त, पिछड़ा दिखनेवाले कोल्लमपल्ली गॉंव का स्वरूप आज बदल चुका है| गॉंव में शिक्षितों का अनुपात काफी बढ़ गया है, अनेक लोगों ने अपने छोटे-छोटे उद्योग शुरू किए है| यह परिवर्तन यहॉं १९९० में आरंभ किए गए ‘ग्रामीण विकास परिषद’ के उपक्रमों के कारण संभव हुआ है|
इस गॉंव की विशेषता यह है कि, यहॉं हर मुहल्ले में एक मंदिर है| इस कारण, इस छोटे गॉंव में ३० से अधिक

Sunday, October 2, 2011

अन्ना हजारे ने रालेगन सिद्धि को आदर्श गाँव कैसे बनाया


  1. नियमित ग्राम सभा का आयोजन
  2. चेक डेम , खेत तालाब , सेप्टिक टंक ,रैन वाटर हार्वेस्टिंग  द्वारा बहते पानी को रोक कर जमीन में वापस भेज कर जल का संगरक्षण कर के जल स्तर को ऊपर उठाना ( ये सबसे जरुरी व् मूल कार्य है )
  3. एक व्यक्ति एक पेड़ योजना
  4. चराई बंदी
  5. नशा मुक्ति
  6. जनसंख्या नियंत्रण
  7. फेल बच्चो का स्कूल
  8. अनिवार्य सामूहिक श्रमदान 
  9. गाँव में केवल सामूहिक विवाह कार्यक्रम
  10. अनाज बैंक की  स्थापना 
  11. सभी घरो में सिवरेज  टेंक बनाकर पानी को सडको पर बहने से रोकना
  12. सभी काम करने वालो को जिम्मेदारियों का बटवारा और सभी को बराबर का सम्मान
  13. नीम , आम आदि पेड़ो की नर्सरी बनाकर बेचना (केवल गाँव के बच्चो और महिलाओ द्वारा)
  14. हर साल २ अक्टूबर को गाँव का जन्म दिन के अवसर पर गाँव के सबसे बुजुर्ग महिला और पुरुष का सम्मान
  15. हर साल २ अक्टूबर को गाँव का जन्म दिन के अवसर पर गाँव के मेघावी बच्चों का सम्मान
  16. हर साल २ अक्टूबर को गाँव का जन्म दिन के अवसर पर गाँव के कर्मठ व्यक्ति का सम्मान 
  17. हर साल २ अक्टूबर को गाँव का जन्म दिन के अवसर पर गाँव के सभी लोगों का सामूहिक भोज 
  18. श्रम दान का एक उदाहरण - 10 लाख का स्कूल के प्रोजेक्ट को श्रम दान कर के 4 कमरों के स्थान कर 8  कमरों का स्कूल बनाया जिसकी मूल्यांकन 30 लाख रुपया था

    आभार - ऋषि केश खिलारी (मेल घाट  वाले ) मोबाइल : 09325665122   ईमेल : desrushikesh@gmail.com

Saturday, September 10, 2011

वलनी (नागपुर ) - जीवन बदलता एक पानीदार गाँव

  जीवन बदलता एक पानीदार गाँव

                                                        वलनी में किसानों का कायाकल्प कर दिया तालाब ने 

रहिमन कह गए हैं, बिन पानी सब सून...., नागपुर से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक गाँव ने पानी की महत्ता को कैसे समझा और स्वीकारा बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार सुनील सोनी.

इस बार वलनी के ग्राम तालाब की पार पर खड़ा हुआ तो दिल भर आया. हरे, मटमैले पानी पर हवा लहरें बनाती और इस किनारे से उस किनारे तक ले जाती. लगता दिल में भी हिलोरें उठ रही हैं. कहाँ था ऐसा तालाब ? जो था,

Sunday, February 27, 2011

टाल क्षेत्र - मसुकदाना की खेती से किसान खुश

टाल क्षेत्र के किसान कल तक कम पैदावार होने और लागत भी न निकल पाने की शिकायत कर रहे थे, लेकिन अब वे परंपरागत खेती को बाय-बाय कहकर नई खेती अपना रहे हैं. मोकामा-टाल के अधिकांश किसान भले ही आज भी क्षेत्र के एक फसली और टाल योजना लागू न होने का

पिपलांत्रीः जगमगाती गलियां और वातानुकूलित पंचायत भवन

उदयपुर से तक़रीबन 70 किलोमीटर दूर राजसमंद ज़िले में एक ग्राम पंचायत है पिपलांत्री. 16 सौ की आबादी वाली यह ग्राम पंचायत विकास के नित नए सोपान रच रही है. अरावली की संगमरमर की पहाड़ियों पर बसे पिपलांत्री को देखकर गर्व होता है कि भारत गांवों का देश है और अब गांव भारत के लोकतंत्र को सही मायनों में परिभाषित कर रहे हैं. यह यहां के लोगों द्वारा मिलजुल कर लिए गए फैसलों का ही नतीजा है कि पिछले कई सालों से सूखे की मार झेल रहे पिपलांत्री की पहाड़ियों से मीठे पानी के

गोपालपुरा: सामूहिक निर्णय प्रक्रिया से बदली तस्वीर



राज्य कभी नहीं चाहता कि समाज एकजुट, मज़बूत और आर्थिक रूप से संपन्न हो. वह हमेशा चाहता है कि समाज बंटा रहे, टूटा रहे, इस पर आश्रित रहे और गुलाम मानसिकता में जीना सीख ले. यहां तक कि गुलामी के दिनों में भी समाज के मामलों में राज्य का इतना हस्तक्षेप नहीं था, जितना स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक भारत में बढ़ता चला गया. अब तो समाज व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दिया गया है और राज्य ही समाज का स्थान

मुस्‍कराएं, आप बख्‍तावरपुरा , झुंझनू में हैं


ग्रामसभाओं की निष्क्रियता के कारण सरकारी पंचायतों में काफी भ्रष्टाचार है. ग्रामसभा के नाम पर कुछ लोगों के हस्ताक्षर करा लिए जाते हैं और खानापूर्ति हो जाती है. वास्तविक ग्रामसभा बैठती ही नहीं है. लेकिन देश के कुछ ऐसे गांव हैं, जो इस स्थिति को बदलने की कोशिश में लगे हुए हैं. वे पंचायत के प्रस्तावों की समीक्षा कर रहे हैं और कोशिश कर रहे हैं कि ग्रामसभा को मज़बूत बनाया जा सके, ताकि सरकारी प्रस्तावों की ठीक-ठीक समीक्षा हो और अनुचित प्रस्ताव पारित न हो सकें. नतीजतन, इन प्रयासों के परिणाम भी दिखने लगे हैं. अब पंचायतों के जन प्रतिनिधि एवं कर्मचारी

गंगादेवी पल्‍ली में बही विकास की गंगा


आंध्र प्रदेश के वारंगल ज़िले की मचापुर ग्राम पंचायत का एक छोटा सा क्षेत्र था गंगादेवी पल्ली. ग्राम पंचायत से दूर और अलग होने के चलते विकास की हवा या कोई सरकारी योजना यहां के लोगों तक कभी नहीं पहुंची. बहुत सी चीजें बदल सकती थीं, लेकिन नहीं बदलीं, क्योंकि लोग प्रतीक्षा कर रहे थे कि कोई आएगा और उनकी ज़िंदगी संवारेगा, बदलाव की नई हवा लाएगा. क़रीब दो दशक पहले गंगादेवी पल्ली के लोगों ने तय किया कि वे ख़ुद एकजुट होंगे और बदलाव की हवा स्वयं लेकर आएंगे, जिसका वह अब तक स़िर्फ इंतज़ार कर रहे थे. आज गंगादेवी पल्ली एक प्रेरणादायक

Saturday, February 12, 2011

सागर जिला : किसान गांव में ही रहे इसलिए…

Manoj Gupta-भारत कुमार
मध्य प्रदेश के सागर जिले के लोहे के व्यापारी मनोज गुप्ता जब वर्षों पहले शिशु मंदिर विद्यालयों से जुड़े हुए थे तो उन्हें एक चीज ने बड़ी टीस दी थी। वो ये कि जब विद्यार्थियों से मासिक स्कूल फीस के लिए कहा जाता तो अगले दिन वो अपने कक्षा अध्यापक से आकर कहते, ”पिताजी नेकहा है कि फसल तैयार होने पर उसे बेचकर सारे महीने की फीस एक ही साथ दे देंगे।”
मनोज गुप्ता को यह बात बड़ी कचोटती कि जो आदमी आदमी की सबसे आवश्यक जरूरत अनाज का उत्पादन करता है, जिसके बगैर आदमी के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती, उसे अपने बच्चे की फीस भरने और नई धोती खरीदने के लिए छ: महीने तक इंतजार करना पड़ता है। अन्य लोगों की तरह उसे हर महीने क्यों नहीं

गुणों का गांव राजूखेड़ी



Rajukhedu village-उमाशंकर मिश्र
मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के राजूखेड़ी गांव के निवासी गरीब और पिछड़ेपन के शिकार भले ही रहे हों, लेकिन उन्होंने किसी पर निर्भर रहने की बजाय अपने जीवन की बेहतरी का रास्ता खुद तैयार कर लिया है। राजूखेड़ी को एक व्यवस्थित एवं संपन्न गांव बनाने से लेकर ‘निर्मल पंचायत’ का राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाने में जनभागीदारी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
वर्ष 2008 में गैर सरकारी संस्था ‘समर्थन’ के हस्तक्षेप के बाद राजूखेड़ी के विकास का एक रोडमैप तैयार किया गया। इसमें स्थानीय लोगों को किसी पर आश्रित करने की बजाय उन्हें भारतीय संविधान में वर्णित जनाधिकारों से परिचित कराया गया एवं एजेंसियों के बारे में भी ग्रामीणों को जानकारी दी गई। इतना सब कुछ जान लेने के पश्चात जब राजूखेड़ी के ग्रामीणों को जनता की ताकत और अधिकारों का ज्ञान हुआ तो सबने

Tuesday, February 8, 2011

जल संगरक्षण के बारे में पुरे जानकारी प्राप्त करे

 किसी भी  गाँव को आदर्श गाँव बनाने के लिए सबसे पहला कदम  होता है गाँव में पानी को उपलब्ध  करवाना  जो के जल संरक्षण के विभिन्न विधियों से ही  हो सकता है. एक आदर्श गावं के कल्पना बिना जल संगरक्षण के नहीं हो सकती . जल संगरक्षण के बारे में पुरे जानकारी प्राप्त करे

सूपर हिट फिल्म "हिवरे बाजार" खुद देखे और गावं गावं में दिखाएँ

यह फिल्म वस्तुत: 23 मिनट की एक डाक्यूमेंट्री फिल्म है जो महाराष्ट्र के हिवरे बाजार गांव में पिछले 20 साल में आए चमात्कारिक परिवर्तन का मंत्र खुद उस गांव के लोगों की जबानी बयां करती है।

फिल्म : हिवरे बाजार में स्वराज
अवधि : 23 मिनट
सहयोग राशि : 20 रुपए (डाक से मंगाने के लिए 50 रुपए पैकिंग व डाकखर्च अलग)
सीडी/डीवीडी मंगवाने के लिए संपर्क करें- 09968450971


गांव देखो! स्वराज देखो! हिवरे बाजार देखो

Hiware Bazar-विमल कुमार सिंह
फिल्में सपनों की दुनिया में ले जाती हैं, हर उम्र और वर्ग के लोग फिल्में देख-देखकर सपनों में जीते रहे हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार, मध्यप्रदेश आदि कई राज्यों के गांवों में आजकल एक ऐसी फिल्म लोकप्रिय हो रही है जो वर्षों पुराने एक सपने को सच करने के लिए प्रेरित कर रही है, यह सपना है स्वराज का सपना। देश में सच्चे लोकतंत्र की स्थापना का सपना, जहां आम आदमी व्यवस्था का मालिक सिर्फ लोकतंत्र की परिभाषा में ही नहीं बल्कि हकीकत में भी हो।


Sunday, February 6, 2011

गाजीपुर - हस्तक्षेप का हौसला…


हस्तक्षेप का हौसला…

wall writing-राकेश राय
युवाओं के आदर्शवाद को सुगम करने, उन्हें पल्लवित-पुष्पित करने की बजाए हमारी भ्रष्ट व्यवस्था उनके मार्ग में कांटे बोती है। इसके बावजूद कुछ युवा समाज में सार्थक बदलाव के लिए हस्तक्षेप का हौसला रखते हैं। गाजीपुर के युवा राकेश राय ने अपने गांव की व्यवस्था को बदलना चाहा। इस दौरान उन्हें जो अनुभव हुए उसे देश के तमाम युवाओं को भी जानना चाहिए। सफलता और असफलता के बीच झूलते उनके प्रयास को आइए उन्हीं की जबानी सुनते हैं...
मेरे गांव के पड़ोस के गांव में एक दिन मल्लाहों की बस्ती में भयंकर आग लगी। शाम का समय था। मैं भी वहां पहुंचा। दृश्य अत्यन्त कारुणिक था। कोई 50 परिवारों की मल्लाहों की बस्ती मे 90 प्रतिशत घर घास-फूस और खरपतवार से बने होने के कारण पूरी तरह से जल कर समाप्त हो गये थे। वहां मैंने देखा कि एक 6 वर्षीय बालक ठंड में नंगे बदन खड़ा है। मैंने उसकी मां से कहा कि इसे कपडे पहना दो तो वह बोली, ”हमारे पास कपड़ा हो तब तो पहनाऊं, सब कुछ जल कर खाक हो गया।”
उसके उत्तर ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। मेरे मन में उनके लिए कुछ करने की प्रेरणा जगी। मैं घर आया और अपने पांच घनिष्ठ मित्रों से कहा कि पास के गांव पर विपत्ति आई है। हमें उनकी सहायता स्वरूप कुछ सामान और वस्त्राों की व्यवस्था तत्काल करनी चाहिए। फिर हमने अपने गांव के हर दरवाजे से अन्न, वस्त्रा और धन एकत्रित किया। पूरे दिन मेहनत करने के बाद सायं तक सैकड़ों किलो चावल, गेहूं, आटा, दाल, आलू, प्याज के साथ नये-पुराने हजारों वस्त्राों का ढेर हमारे सामने था। इसके अलावा एक अच्छी खासी

कोटपूतली - एक उद्यमी किसान ऐसा भी


किसानों की समस्याएं और सामाजिक कार्यों के चलते 1977 में निर्विरोध वार्ड पंच चुन लिया गया और 1978 में पंचायत के सभी किसानों की भूमि की पैमाइश कराई। पूरे गांव की जमीन को एकत्रित कराकर जमीन की चकबंदी कराई और जमीन के टुकड़ों की समस्या को सदा के लिए दूर कर दिया
मैंने होश संभाला तब पिताजी लाव-चरस से खेती करते थे। साठ बीघा जमीन थी लेकिन दो बीघा जमीन पर भी मुश्किल से खेती होती थी। ‘भारतीय कृषि मानसून का जूआ है।’ यह उन दिनों बिल्कुल सटीक बैठती थी। सातवीं कक्षा मंे ही बालक कैलाश के हाथ से कागज कलम छूट गये और हल फावडे़ ने उसकी जगह ले ली। वक्त हाथ में कैद मिट्टी के कणों की तरह धीरे-धीरे फिसलता रहा। सन 1970 में अलग कुंआ खुदवाया और रेहट लगाकर खेती शुरू की। पहले जहां दो बीघा जमीन पर ही श्वास धौकनी की तरह चलने लगती थी वहीं रेहट ने अब मुश्किलों को कुछ आसान बना दिया। छोटा भाई गिरधारी भी थोड़ा जवान हो गया, उसने भी ऊंट के

Sunday, January 9, 2011

From a rickshaw puller to a successful innovator!

Source : http://business.rediff.com/slide-show/2010/sep/02/slide-show-1-from-a-rickshaw-puller-to-an-innovator.htm

Dharamveer Kamboj with his machine.

From being a rickshaw puller in New Delhi to becoming an organic farming expert and an innovator, it has been an amazing journey for this farmer from Damla village in Haryana. There was a time when Dharamveer Kamboj could not even afford to pay for his daughter's school fees. "I spent about two years as a rickshaw puller. Unfortunately, I met with an accident and had to return to my village. As I was bedridden for months, my wife had to face lot of hardships," he says.
After he got well, he did not want to go back. He started to do organic farming in his village.
During his childhood, he used to help his mother while collecting herbs and was aware of the healing properties of medicinal plants. So he decided to plant aloe vera and stilia on a large scale, besides starting a nursery of medicinal plants.
But there was a problem. There was no way to process the yield into useful products. He needed a multipurpose food processing machine...
With his limited resources, he struggled for over eight months to design and build the first prototype of a cost-effective multipurpose food processing machine.
"Last month, I got the opportunity to give a demonstration of this machine to our chief minister, Bhupinder Singh Hooda. He was very impressed with my innovation. I have now been appointed as one of the board members at the Hisar Agricultural University. It is a great honour for me. Even President Pratibha Patil has asked me for a food processor," says an excited Dharamveer.

You can send an e-mail to Dharamveer at kissandharambir@gmail.com; Mobile: 98960 54925

Dharamveer's machine.
Early years Dharamveer spent most of his time experimenting even during his school days. He used to take

This poor farmer has the answer to India's food crisis

Prakash Singh Raghuvanshi.

Apni kheti, apna khaad / Apna beej, apna swaad  
अपनी  खेती , अपना  खाद  / अपना  बीज , अपना  स्वाद
(Our own farm, our own fertiliser / Our own seeds, our own taste) -- Prakash Singh Raghuvanshi.

A farmer from Tandia village in Varanasi has a solution to India's burgeoning food crisis.
In a land where poverty, hunger, malnutrition and farmer suicides are rampant, Prakash Singh Raghuvanshi's innovation could work wonders.
He has single-handedly developed a number of high yielding, nutritious and disease-resistant varieties of wheat, paddy, pigeon pea (tur dal) and mustard, which can also withstand adverse weather changes.
Financial problems and falling crop yield prompted him to think about starting a seed bank of the best varieties of crops.
It has been a relentless crusade of over five years, despite lack of funds, formal education, illness, and weak eyesight to develop the best quality seeds in India. But there seems to be no end to his woes.
"The Union Bank has sent a notice as I have not been able to pay up the loan. They will seize my property if I do not pay Rs 75,000 immediately. I can't imagine losing my precious land. I hope someone will help me out of this crisis," he says.
"I believe that God has given me the power to help other farmers and help my country be self-sufficient in foodgrain production. Every variety I developed has a yield of 20-40 per cent more than the ones available in the market. I can challenge anyone to grow a better variety of crop beside my plot," says 50-year-old Prakash Singh, who is ushering in a unique green revolution by supplying seeds free of cost to hundreds of thousands of farmers across India.

 how Prakash Singh Raghuvanshi triumphed against all odds to transform India's agriculture sector...
You can send an e-mail to Prakash Singh at kudaratraghuvanshi@hotmail.com.
Mobile: 09956 941993 Photographs, courtesy: National Innovation Foundation.

President Pratibha Patil looks at different high yielding varieties.
No help from the government yet Prakash Singh has developed over 80 varieties of high yielding wheat,

पुणे के किसान की सफलता की कहानी - अभिनव फार्मर्स क्लब

Source : http://www.rediff.com/business/slide-show/slide-show-1-the-rags-to-riches-story-of-a-farmer/20101227.htm

Dnyaneshwar Nivrutti Bodke with his wife at his farm in Hinjewadi.

Some 20-odd kilometres off the Pune-Mumbai road, near Baner, a fork to the left goes to Hinjewadi. Just five years ago, the landscape was lush with green fields that produced rice, jowar, bajra, sugarcane amongst other crops.
Off late, Hinjewadi has become famous as an information technology hub that houses the creme de la creme of technology companies, Indian and multinational.
Infosys, Wipro, Cognizant, Tata Technologies, Veritas Software Corporation . . . the list goes on.
While the service sector is fast replacing agriculture as the major employment provider in Hinjewadi, some patches of green still dot the concrete arena.
About three kilometres off this arena, on the same road that cuts off the Pune-Mumbai road, there is a small bungalow owned by a 40-year-old farmer, who had to fight the Maharashtra government so that he and his fellow farmers could continue to grow vegetables.
Dnyaneshwar Nivrutti Bodke is a farmer who hates subsidies and loan waivers. He also keeps off politicians and their promise of freebies.
The only time he availed of the state largesse was to repay his first ever loan.

Mr.Dnyaneshwar Bodke's Contact no is 09422005569
Read full story from
http://www.rediff.com/business/slide-show/slide-show-1-the-rags-to-riches-story-of-a-farmer/20101227.htm